कविता हिंदी

फुरसत

आज कल सब जल्दी में हैं।
सिर्फ मैं ही फुरसत में हूँ।
कोई ज़रा एक लम्हा ठहर जाओ,
मेरे पास आओ।
मेरे जूतों में एक कदम रख भी तो लो,
फुरसत का स्वाद ज़रा चख भी तो लो।
बड़ी मज़ेदार है।

फुरसत आज़ाद है, परिंदों की तरह।
पर उसके पँख नहीं हैं।
क्योंकि वो वहीं रहती है, जहां वो होती है।
उसको उड़ने की ज़रूरत ही नहीं।
वो वहीं, बैठे बैठे ही, आज़ाद है।
ज़मीन पर ही उसका आसमां आबाद है।

फुरसत खुश है, छोटे बच्चे की तरह।
बिना वजह खुश रह सकने वाले छोटे बच्चे की तरह।
पर वो हंसती नहीं। सिर्फ मुस्कुराती है।
कभी खुली आंख रख के
तो कभी आंखें बंद कर के,
सिर्फ मुस्कुराती है।
और मुझे सुकून से मिलवाती है।

फुरसत अंधेरा है, सफेद अंधेरा।
मानो अमावस की रात को गुफ़ा में सवेरा।
उसे अंधेरे में सब दिखता है, साफ साफ।
वो कहती है कि, उजालें उसे रास नहीं आते।
इसी लिए चमक-धमक भी तो
उसके आस पास नहीं आते।

फुरसत दवा है, और हवा है।
बड़े बड़े भागने वालें ढूंढते हैं उसे।
और सरकार, कहाँ कहाँ नहीं ढूंढ़ते!
मकानों में, दुकानों में,
रास्तों में, वास्तों में,
रिश्तों में, रिश्तों की किश्तों में।
पर वो नहीं मिलती।
और ऐसे मिलेगी भी कैसे?
वो दवा तो है, पर हवा है।
दिखेगी नहीं।
पर सही जगह ढूंढो तो मिल सकती है।
और मिल जाये तो ज़िन्दगी खिल सकती है।

में उसका वकील नहीं।
नाही वो मेरे सिर पर सवार है।
पर सच, तुम्हारी कसम,
फुरसत बड़ी मज़ेदार है।


Photo Credit: congerdesign

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